मंडी ! भोले शंकर वास करते है सुंदरनगर की सुकेत रियासत में – आचार्य रोशन शर्मा !

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सुंदरनगर ! जनश्रुति के अनुसार कहा जाता है कि कलिंग देश जिसे वर्तमान में उड़ीसा के नाम से जाना जाता है। दो अबोध सन्यासी भ्रमण करते करते लोमश ऋषि के आश्रम रिवालसर नामक स्थान पर आ पहुंचे। दोनों सन्यासी लोमश ऋषि से अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति करना चाहते थे। परंतु लोमश ऋषि ने उन्हें व्यास पुत्र शुकदेव आश्रम भेजा। दोनों सन्यासी सुखदेव आश्रम पहुंचे जहां पर उन्होंने शुकदेव ऋषि से शिव के द्वारा पार्वती को सुनाई गई अमर कथा का श्रवण करवाया। सन्यासियों को अष्टांग योग की दीक्षा देकर ताम्रगिरि पर्वत पर शिव भक्ति करने का आशीर्वाद प्रदान किया। कहा जाता है की दोनों संन्यासियों ने ताम्रगिरी पर्वत की कंदरा में लंबे अरसे तक तप किया।

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इन्हीं गुफाओं में से एक चमत्कारिक गुफा आज भी विद्यमान है जहां पर इन दोनों संन्यासियों ने शिव आराधना की। आज भी लोग यहां पर शिव भक्ति व दर्शनार्थ करने के लिए से दूर-दूर से आते हैं। यह स्थान साधना के लिए अति पवित्र माना जाता है। कलिंग देश से आए संन्यासियों के तप करने से इस स्थान का नाम कुलवाड़ा महादेव नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस स्थान की एक महता बहुत ही रोचनीय है।

कहते हैं कि इस गुफा के अंदर से मृदंग की आवाज आया करती थी। मानो गुफा के अंदर शिव तांडव हो रहा हो। आज भी अगर गुफा के ऊपरी भाग को हाथ से बजाया जाए तो अंदर से मृदंग की आवाज सुनाई देती है। इस गुफा का प्रवेश द्वार योनि आकार का है। अंदर जाकर एक प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित है। जिसकी स्थापना के विषय में कोई भी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पा रही है। जनश्रुति के अनुसार लोगों का कहना है कि इस स्थान से अजीबो-गरीब आवाजें आया करती थी। जिनको सुनकर लोग हतप्रभ रह जाते थे। कहते हैं कि इस स्थान से कुछ एक आवाजें इस प्रकार की होती थी। जिसमें कहा जाता था अगर इस स्थान पर पाँच प्रकार ब्राह्मण, कन्या, गाय,औरत और राजपरिवार के किसी व्यक्ति की बलि इस स्थान पर दी जाए तो इस स्थान से तांबा ही तांबा निकलेगा जिसके कारण लोगों ने इस पहाड़ी का नाम त्रांबली धार रखा।

कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि उस समय के लोग इस घनघोर जंगल में जाकर खोजने लगे कि यह आवाजें कहां से आ रही है। उन लोगों ने देखा कि यहां पर अनेक गुफाएं हैं जिनमें से एक गुफा के अंदर से आवाजें निकल रही है लोगों ने इस स्थान को कुलदेव के नाम पूजना शुरू किया और शिव पूजा करने लगे। जिसके उपरांत इस प्रकार की घटनाएं कम होने लगी। वर्तमान में इस स्थान को कुलवाडा वासियों के अलावा अनेक शिव भक्तों ने इस स्थान को सुदृढ़ बनाकर आने जाने वाले शिव भक्तों के लिए ठहरने की भी व्यवस्था की है।

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