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शिमला ! हिमाचल की मंडियां ऑनलाइन अभी तक नहीं हो पाई हैं और न ही प्रदेश के लाखों किसानों-बागवानों का शोषण रुका है ! प्रदेश की 19 मंडियों का ऑनलाइन पंजीकरण कागजों तक ही सीमित है ! मंडियां ऑनलाइन न होने से फसलों की ई-बिक्री नहीं हो रही है ! प्रदेश में बागवानों और किसानों को फसलों की ई-बिक्री न होने से परेशानी हो रही है ! डिजिटल के ज़माने में बागवान आज भी पुराने तरीके से फसलों को मंडियों में ले जाकर बेचने को विवश हैं ! मंडियों में इन्हें कई बार आढ़तियों और लदानियों के हाथों शोषण का शिकार होना पड़ता है जिसमे कई बार बाहरी राज्यों के लदानी और आढ़ती किसानों और बागवानों की फसलों के साथ गायब हो जाते हैं जिसका सीधा असर किसानो पर पड़ता है ! किसान की पुरे वर्ष की मेहनत कुछ पलो में ही साफ हो जाती है ! ऐसे में किसान किस पर विश्वास करे , किस पर न करे ये असमझस की स्थिति किसान और बागवानों में हमेशा सताती रहती है ! यह समस्या पिछले कई सालों से सामने आ रही है ! इस समस्या से निपटने के लिए प्रदेश की प्रथम चरण में 19 मंडियां ऑनलाइन होनी थी ! अब देखने वाली बात यह है की सरकार इस पर कब तक अमलीजामा पहनाती है ताकि किसान और बागवानों को उनके साथ धोखा होने का डर न रहे और अपनी फसलों को निश्चिन्त होकर मंडियों में ले जा कर बेच सके !
शिमला ! हिमाचल की मंडियां ऑनलाइन अभी तक नहीं हो पाई हैं और न ही प्रदेश के लाखों किसानों-बागवानों का शोषण रुका है ! प्रदेश की 19 मंडियों का ऑनलाइन पंजीकरण कागजों तक ही सीमित है ! मंडियां ऑनलाइन न होने से फसलों की ई-बिक्री नहीं हो रही है ! प्रदेश में बागवानों और किसानों को फसलों की ई-बिक्री न होने से परेशानी हो रही है ! डिजिटल के ज़माने में बागवान आज भी पुराने तरीके से फसलों को मंडियों में ले जाकर बेचने को विवश हैं ! मंडियों में इन्हें कई बार आढ़तियों और लदानियों के हाथों शोषण का शिकार होना पड़ता है जिसमे कई बार बाहरी राज्यों के लदानी और आढ़ती किसानों और बागवानों की फसलों के साथ गायब हो जाते हैं जिसका सीधा असर किसानो पर पड़ता है ! किसान की पुरे वर्ष की मेहनत कुछ पलो में ही साफ हो जाती है ! ऐसे में किसान किस पर विश्वास करे , किस पर न करे ये असमझस की स्थिति किसान और बागवानों में हमेशा सताती रहती है ! यह समस्या पिछले कई सालों से सामने आ रही है ! इस समस्या से निपटने के लिए प्रदेश की प्रथम चरण में 19 मंडियां ऑनलाइन होनी थी ! अब देखने वाली बात यह है की सरकार इस पर कब तक अमलीजामा पहनाती है ताकि किसान और बागवानों को उनके साथ धोखा होने का डर न रहे और अपनी फसलों को निश्चिन्त होकर मंडियों में ले जा कर बेच सके !
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