कुल्लू ! पर्यटन के बाद गुच्छी कारोबार पर भी अब गहरा प्रभाव !

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2001
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कुल्लू । कोरोना संक्रमण के चलते जहां सूबे में पर्यटन व्यवसाय प्रभावित हुआ है। वहीं अब हिमाचली गुच्छी के कारोबार पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय मार्केट में गुच्छी की डिमांड इन दिनों शून्य हो गई है। यूरोपियन देश फ्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैंड और पड़ोसी मुल्क चीन हिमाचली गुच्छी के बहुत बड़े ग्राहक हैं, लेकिन यूरोप के देशों में जिस तरह से कोरोना का असर है। उसके बाद यूरोपियन देशों और चीन से गुच्छी की डिमांड नहीं आ रही है।

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इसके चलते व्यापारियों ने गुच्छी की खरीद बंद कर दी है। हिमाचल के व्यापारी दिल्ली में डिमांड के अनुसार किसानों से गुच्छी खरीदते थे, लेकिन इस बार मुख्य केंद्र दिल्ली में डिमांड ही नहीं मिली। ऐसे में व्यापारी कोई जोखिम नहीं ले रहे हैं। अगर यही स्थिति बनी रही तो किसानों की मेहनत पर इस बार पानी फिर सकता है। कुल्लू और प्रदेश के अन्य जिलों में किसानों ने फरवरी, मार्च और अप्रैल के महीनों में जंगलों से गुच्छी तलाश की है। हालांकि गुच्छी के दाम पिछले साल कुल्लू में सात हजार रुपये प्रतिकिलो तक थे। मार्च से लेकर लॉकडाउन चला हुआ है। ऐसे में 90 फीसदी किसानों के पास गुच्छियों का स्टॉक डंप पड़ा हुआ है। इसे बेचने को लेकर वे चिंतित हैं।

गौर रहे कि गुच्छी औषधीय गुणों से भरपूर एक जड़ी-बूटी है। इसका इस्तेमाल दवाइयां बनाने के साथ इसे खाने से भी कई बीमारियां भी दूर होती हैं। यह प्राकृतिक रूप से जंगलों में उगती है।

कुल्लू में जड़ी-बूटियों के व्यापारी हेमराज शर्मा ने कहा कि विश्व के जो देश हिमाचली गुच्छी खरीदते थे। वहां कोरोना के चलते लॉकडाउन है। इस कारण अंतरराष्ट्रीय मार्केट में गुच्छी की डिमांड जीरो हो गई है। इसलिए व्यापारी भी माल नहीं खरीद रहे हैं। किसानों के पास स्टॉक डंप पड़ा है।

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